माधव

प्रयागराज के देवता “माधव”

संसार के पालक भगवान विष्णु प्रयागराज के देवता हैं।इन्हे माधव कहा गया है। हमारे शास्त्रों में माधव के 12 स्वरूप बताए गए हैं । इनका अलग-अलग स्थान है। इनकी पूजा से विशेष मनोवांछित फल भी मिलता है। प्रयागराज के अक्षय वट के साथ गंगा यमुना के संगम के अलावा 8 दिशाओं में विष्णु स्वरूप माधव विराजते हैं।

 परमात्मा माधव की शरण में आने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह मनोवांछित फल देने वाले और उनकी चरण में आने से सभी तरह के पाप की मुक्ति हो जाती है। माधव का ऐसा प्रभाव है कि सभी प्रयाग क्षेत्र में आकर माधव के पास रहना चाहते हैं।

इंद्र, कुबेर,परशुराम वशिष्ठ विश्वामित्र योगनियां सभी इस मधुर क्षेत्र में माधव के समीप रहते हैं।

 पुराणों में माधव की महिमा का वर्णन किया गया है। अक्षय वट जिसका कभी नाश नही होता। यही मूल माधव वट माधव व अक्षय माधव का स्थान शास्त्रों में बताया गया है।

मत्स्य पुराण के पातालखंड, पद्म पुराण व  अन्य पुराण सहित प्रयाग महात्म अष्टाध्याई में माधव के बारे में उल्लेख है। 

फलम् ददातिसर्वेषां कुशलाकुशलात्मनां । श्रमानपेक्ष्यह्यखिलं भक्तानां तु विशेषतः ।।

धर्ममर्थं च कामं च मोक्षंचेति चतुष्टयम् । 

प्रयच्छन्ति यथाकाममकामे मोक्षमेवहि ।।

श्रुतिस्मृतिपुराणानि यंस्तुवन्तिहि माधवम् । 

अमुष्मिन् जागरूकेत्र कः पदार्थोस्ति दुर्लभः ।।

 काश्यां विश्वेश्वरः साक्षादुपदिश्यतु तारकम् । 

मुक्तिददाति पापानां भोगंचैव यथायथम् ।। 

अत्र सर्वाणि पापानि मरणे समुपस्थिते । 

विलयन्ते यथाकामं भुक्तिर्मुक्तिश्च सिध्यति ।। 

 अतोस्मादपरं किंवा दयालुं शरणं वयम् । व्रजेमनतथान्योस्ति भुवनेष्वखिलेष्वपि ।।

पुण्यात्मा और पापी सभी को फल मिलता है। परिश्रम के अनुसार सबको विशेष कर भक्तों को फल मिलता है ।।

 सकाम कर्म करने वाले को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ मिलते हैं और निष्काम कर्म करने वालों को केवल मोक्ष ।। 

 श्रुति, स्मृति, पुराण आदि जिस माधव की स्तुति करते हैं उनकी यदि कृपा है तो कौन पदार्थ दुर्लभ है ।।

काशी में साक्षात् विश्वेश्वर तारक मन्त्र का उपदेश देकर मुक्ति देते हैं और पापियों को कर्मों के अनुसार भोग देते हैं ।। 

प्रयाग में मरण समय उपस्थित होने पर सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और इच्छानुसार भुक्ति तथा मुक्ति मिलती है ।। 

 अतः माधव से बढ़कर किस दयालु  की शरण हम लोग जायें, समस्त भुवन में ऐसा कौन है ? ।।

यह सोचकर सभी उनकी शरण में जाते हैं और जो-जो अर्थ वे चाहते हैं वह वह उनको मिलता है ।।

सर्वविघ्नविनाशार्थं भक्तानांकार्यसिद्धये । दिग्विदिक्ष्वन्यरूपेणचाष्टनामावसाम्यहम् ।

यह श्लोक यह जानने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्रयागराज में माधव का स्थान कहां है। इस श्लोक का अर्थ है कि सब विघ्नों को नाश करने के लिए और भक्तों की कार्यसिद्धि के लिए दिशा विदिशाओं में अन्य रूपों से आठ नाम धारण करके में वहाँ रहता हूँ।

वृक्षोऽक्षयवटस्तत्र मदाधारोविराजते || 

मूले यः पुरुषो दृष्टः सोहमक्षयमाधवः । वटमाधवनामापिमूलमाधवइत्यपि || 

एवं त्रिनामा तत्राहंवसाम्यक्षयपादपे । 

ब्रह्मादिभिः सुरैः सर्वैः सहितस्तीर्थनायके ||

उक्त श्लोक में तीन माधव के स्थान का वर्णन मिलता है। सुवर्ण के समान उसके पत्ते हैं, फल मीठे हैं, वैदूर्य के समान उसकी छाया है, उसका अन्त नहीं है। उसके मूल में कोई पुरुष है। वह तेजस्वी है, चतुर्भुज, मालाधारी श्याम वर्ण एवं पीताम्बरधारी है।

उसको देखकर हम लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ और हम लोग विचरण करते हुए आपके पास आये, आप इसका तत्व कहें ।।

श्रीभगवान बोले- हे ब्रह्मपुत्रों ! आप लोग सावधान होकर सुनें। उस क्षेत्र के वृक्ष का स्वरूप तथा पुरुष के विषय में मैं कहता हूँ।

प्रयाग मेरा क्षेत्र है, वह मेरे लिये वैकुण्ठ से भी अधिक है। वहाँ अक्षयवट वृक्ष है। जो मेरा आश्रय है। मूल में जो पुरुष आप लोगों ने देखा है ,वह मैं अक्षय माधव हूँ। उस पुरुष को वटमाधव और मूलमाधव भी कहते हैं । इस प्रकार तीन नाम धारण करके मैं वहाँ रहता हूँ। 

गंगायमुनयोस्तीरे वेणीक्षेत्रे मनोहरे । 

मध्यवेणीतटे वेणीमाधवोसौ विराजते ।।

धनुर्विशति विस्तीर्ण स्तस्याश्रम उदाहृतः । 

तस्मिस्तिष्ठत्यसौ लक्ष्म्या त्रिवेण्यासहितः सदा ।।

इन्दीवरदलश्यामः कुशेक्षयनिभेक्षणः । 

चतुर्भुजः शंख चक्र गदापद्मधरः प्रभुः ।।

श्रीवत्स कौस्तुभाशोभी पीताम्बर विराजितः । नानालङ्कारशोभिष्ठः प्रसन्नमुख पङ्कजः ।।

त्रिवर्णा त्रिगुणा त्र्यक्षा त्रिविधाघ विनाशिनी । 

त्रिमार्गगा पुरस्तस्य त्रिवेणी राजते भृशम् ।। देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्ध चारणाः । 

चतुःषष्ठिकला विद्या सिद्धयोप्सरसस्तथा ।।

सर्वपीठस्थिताः सर्वे तत्रगत्वा ससाधनाः । 

प्रत्यहं पूजयन्त्येनं वेणीमाधवमादरात् ।।

गंगा यमुना के तट पर मनोहर वेणी क्षेत्र में मध्य वेणी के तट पर वेणीमाधव विराजते हैं ।।

 बीस धनुष के विस्तार में उनका आश्रम है । वहाँ ये त्रिवेणी एवं लक्ष्मी के साथ सदा निवास करते हैं ।। 

 वे नीलकमल के समान श्याम हैं, रक्तकमल के समान उनकी आँखें हैं, चतुर्भुजधारी शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी श्रीवत्स कौस्तुभ से शोभने वाले पीताम्बर धारण करने वाले अनेक आभूषणों से शोभित होने वाले प्रसन्न मुख माधव विराजते हैं ।।

 वेणी तीन वर्ण की, तीन गुण वाली, तीन आँखों वाली और त्रिविध पापों को नष्ट करने वाली है । यह तीन मार्गों से चलने वाली, त्रिवेणी माधव के आगे विराजती है ।।

 देवता, दानव, गन्धर्व, अप्सराएँ, अधिपति अपनी सामग्रियों ऋषि, सिद्ध, चारण, चौसठ कलाएँ, विद्याएँ और सिद्धियाँ, अप्सरायें तथा सब पीठों के *सहित जाते हैं और प्रतिदिन वेणीमाधव की आदरपूर्वक पूजा करते हैं ।। यह वही स्थान है जो आज के समय में संगम मनोज के रूप में जाना जाता है । अमृत वर्षा की कहानी इसी के केंद्र में है। ज्ञानी सदैव गंगा जमुना की कैंची में पवित्र जल अर्थात पदार्थ में स्नान करके पूण्य को प्राप्त करते हैं। इसी जगह की पवित्र जल में कुंभ अर्ध कुंभ में सन्यासी वैष्णव और उदासीन अखाड़े स्नान करते हैं । वास्तव में या ईश्वर का साक्षात्कार और अमृत पान करते है।

जैसा मैं ऊपर लिख आया कि और भगवान विष्णु स्वयं ब्रह्मपुत्रों से कहते हैं कि मैं 8 दिशाओं में विभिन्न रूप में रहता हूं। यहां एक विचारणीय प्रश्न है जब मैं 12 माधव की खोज और शोध करने लगा उसे समय मुझे दो विरोधाभास चीज मिली । एक तो किसी भी शास्त्रीय ग्रंथ में किसी भी माधव का कोई निश्चित स्थान नहीं बताया गया है। माधव मंदिर की प्रमुख व अन्य से वार्ता होने के पश्चात भी मुझे कोई यह नहीं बता पाया कि किस ग्रंथ में मंदिर के स्थान विशेष का उल्लेख है। सभी ग्रन्थों में दिशा ही बताई गई है। 

दूसरा , क्या माधव के मंदिर कभी यहां स्थापित थे ? इसकी खोज करने पर मुझे यह ज्ञात हुआ कि कुछ महात्माओं ने या भक्त श्रद्धालुओं ने अपनी आस्था के अनुसार शास्त्र में वर्णित दिशाओं के अनुसार कुछ मंदिरों की स्थापना कर दी।

अब जैसे वेणी माधव के पांच मंदिर प्रयागराज में स्थापित है। एक दारागंज में दूसरा सिंधिया की धर्मशाला बैहराना, तीसरा बलुआ घाट के पास चौथा अरैल में पांचवा कीटगंज बीच वाली सड़क पर।

सभी मंदिर प्रमुख यह बताते हैं कि पुराण में उल्लेखित है लेकिन किस निर्दिष्ट स्थान पर है, यह नहीं सिद्ध कर पाते।

मेरा शोध इससे अलग है। शास्त्र के अनुसार जल ही यहां प्रमुख है। वेणी माधव का स्थान गंगा जमुना के संगम में 20 धनुष पर है। इसके चारों ओर 8 दिशाओं में आठ माधव जल के किनारे विराजते हैं। यही मेरा मानना है।

इन मंदिरों के बारे में प्रभु दत्त ब्रह्मचारी जी ने एक किताब में एक उल्लेख किया है कि एक मंदिर को एक महात्मा ने अपनी श्रद्धा के अनुसार निर्माण करा दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि समय-समय पर इन मंदिरों का निर्माण श्रद्धालुओं ने  कर दिया। आज भी जिस देवता के प्रति जिस व्यक्ति की श्रद्धा होती है वह अपने गांव घर में उन देवता को स्थापित करता है।

यहां जब हम आठ माधव का स्थान और उनका जिक्र करते हैं, तो हमें यह ध्यान रखना होगा कि जो दिशाएं शास्त्र में बताई गई है, वह अक्षय वट और संगम से ली गई है। अन्य कोई भी प्रतीक चिन्ह या निर्दिष्ट स्थान नहीं बताया गया।

हमारे पूर्वज विद्वान थे । उन्होंने कोई भी गणना, संरचना की और उसको धार्मिक स्वरूप दिया तो उसके पीछे तर्क और कोई ना कोई कारण था। 

यहां जब माधव स्वयं अपने आठ रूपों की बात करते हैं। मुझे यह समझ में आता है कि किसी भी केंद्र के चारों तरफ 8 दिशाएं   होती हैं। जब हम धार्मिक आयोजन या पूजा करते हैं, उस समय भी 8 दिशाओं की पूजा करते हैं। ऐसे में अगर केंद्र में अक्षय वट या वेणी माधव हैं तो उनके चारो ओर एक घेरे में गंगा यमुना के तट पर 8  दिशाओं मे 8 माधव विराजते हैं। यह ज्यादा सटीक और शास्त्रीय लगता है।

मेरा यह भी मानना है कि शास्त्र में 12 माधव के उल्लेख तो किए गए हैं किंतु इसके कोई मंदिर नहीं था। ऐसी दशा में बाद में श्रद्धावश कुछ लोगों ने कुछ माधव के मंदिर बना लिए । शेष की खोज  यह समझकर की जाती रही,

 कि उनके भी मंदिर होंगे । जबकि ऐसा नहीं है। किसी कालखंड में किसी मंदिर का कोई उल्लेख कभी भी नहीं मिला। वर्तमान में कुछ मंदिरों का जिक्र है। वह भी समझ से परे है ।   आठ माधव में एक मंदिर में एक सुलेम सराय में स्थापित है एक सुजावन देव के पास है। इसी तरह एक छिंवकी के पास है। यह यहां क्यों स्थापित है ? इसका कोई, शास्त्र में उल्लेख नही है । एक माधव संकष्टहर माधव का भी जिक्र बाद के श्लोक में आया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि इन माधव को बाद में जोड़ा गया है।

शास्त्र मैं आठ माधव के नाम उनके स्थान का जो जिक्र है।  वह अब मैं लिखता हूं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top