तीर्थराज प्रयागराज?


तीर्थराज प्रयागराज को सही अर्थों में जानने के लिए हमें अपनी अनेक जिज्ञासाओं का समाधान करना होगा—


आज जिस भौगोलिक क्षेत्र को प्रयागराज कहा जाता है, उसे पहली बार कब पहचाना गया? इसका उल्लेख कब और किस नाम से हुआ?
यहां प्राचीन काल में कौन लोग रहते थे और उनका जीवनयापन किस प्रकार होता था?
इस क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएं क्या थीं?
वैदिक काल में यहां क्या गतिविधियां हो रही थीं?
यहां कौन-कौन सी महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं?
महर्षि भरद्वाज और महर्षि वाल्मीकि का इस क्षेत्र से क्या संबंध रहा?
क्या भरद्वाज आश्रम एक महत्वपूर्ण पीठ के रूप में स्थापित हुआ था?
भरद्वाज आश्रम का पतन या अंत कैसे हुआ?
‘माधव’ के संदर्भ में पुरातात्विक रिपोर्ट क्या कहती है?
‘माधव’ के उल्लेख किन-किन स्रोतों में मिलते हैं?
इन जिज्ञासाओं का समाधान किए बिना प्रयागराज को सही रूप में समझ पाना संभव नहीं है।
भारतीय सनातन परंपरा में गुरुजन व्यक्तिगत इतिहास लिखने के बजाय जनकल्याण से संबंधित ग्रंथों की रचना करते थे। यद्यपि अधिकांश गुरुकुल राजाओं के संरक्षण में होते थे, फिर भी वहां के आचार्य सभ्यता के विकास और मानव कल्याण के विषयों पर अधिक ध्यान देते थे। इसी कारण वैदिक काल के ग्रंथों में व्यक्तियों के विस्तृत इतिहास का अभाव मिलता है।
व्यक्तिवादी इतिहास लेखन की परंपरा मुख्यतः मध्यकाल में मुगलों के समय से प्रारंभ हुई। मुगल काल में भी हमारे प्राचीन ग्रंथों का अनुवाद किया गया। इसके पश्चात अंग्रेजों के शासनकाल में, अपने प्रशासनिक उद्देश्यों के अनुरूप, भारतीय समाज और ग्रंथों का पुनः विश्लेषण और पुनर्लेखन किया गया। एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के माध्यम से हमारे ग्रंथों का संकलन, पुनर्लेखन और पुनः प्रकाशन किया गया। इस कार्य के लिए संस्कृत विद्वानों और मौलवियों की नियुक्ति की गई।
इस समस्त प्रक्रिया का एक प्रमुख उद्देश्य समाज को समझना ही नहीं, बल्कि उसे विभाजित करना भी था। यहां तक कि हमारे यहां प्रचलित लोक कहावतों का भी व्यवस्थित संकलन कराया गया।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि सनातन परंपरा में प्रयागराज को इतना विशेष स्थान क्यों प्राप्त है? इसे ‘तीर्थराज’ क्यों कहा गया? अमृत मंथन और उससे जुड़ी कथाएं इसी स्थान से क्यों संबंधित हैं? प्रयागराज के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान को यह सर्वोच्च पदवी क्यों नहीं मिली?
क्या गंगा केवल प्रयाग तक ही सीमित है? मोक्ष की कामना के लिए यह स्थान इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया? प्रलय और सृष्टि के केंद्र के रूप में प्रयागराज का उल्लेख क्यों मिलता है? भगवान विष्णु का यह प्रिय क्षेत्र क्यों माना गया? क्या धार्मिक ग्रंथों में वर्णित ‘स्वर्ग’ की अवधारणा का संबंध किसी रूप में प्रयागराज से है? और भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर किसी एक ग्रंथ में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलते, किंतु विभिन्न ग्रंथों में इनके परिणामस्वरूप घटित घटनाओं का उल्लेख अवश्य मिलता है।
वर्षों के शोध, विभिन्न प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन और विद्वानों के मतों के आधार पर संकलित सामग्री को यहां यथावत प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। मैं भी अपने शोध को यहां संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।
यह स्पष्ट है कि प्रयागराज को धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समझने के लिए उसके भूगोल को समझना अत्यंत आवश्यक है। जब तक हम इसके भौगोलिक स्वरूप को नहीं समझते, तब तक इसके तथ्य और घटनाएं आपस में जुड़कर स्पष्ट रूप में सामने नहीं आतीं।
मेरा विश्वास है कि हमारे पूर्वज विद्वान थे और उन्होंने बिना किसी ठोस कारण के कोई भी तथ्य नहीं लिखा। उनकी सोच वैज्ञानिक थी, केवल आस्थापरक नहीं।
यहां सब कुछ प्रस्तुत करना संभव नहीं है, किंतु अपने वर्षों के शोध का सार संक्षेप में प्रस्तुत कर रहा हूं। अब यह पाठक पर निर्भर है कि वह इसे किस प्रकार स्वीकार करता है।
— वीरेन्द्र पाठक
संस्थापक, प्रयागराज विद्वत् परिषद

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